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Saleem Khan

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आपने कभी सोचा है कि औरतों को दाढ़ी क्यूँ नहीं उगती?

आपने कभी सोचा है कि औरतों को दाढ़ी क्यूँ नहीं उगती? इसके पीछे की असली वजह क्या है? आखिर ईश्वर ने ऐसा क्या कर दिया कि मर्दों को दाढ़ी मूंछ दी लेकिन औरतों को नहीं...

तो आईये जानते हैं इसका कारण-

जब बच्चा जन्म लेता है तो उसके शरीर पर केवल रोयें जैसे बाल ही होते हैं. लेकिन जैसे जैसे वह बड़ा होता है उसके बाल कड़े और मज़बूत होते जाते हैं. 11-13 की उम्र से लड़के और लड़कियों के शरीर में में केश वृद्धि होना शुरू होती है. यही वह उम्र होती है जब सेक्स ग्रन्थियों की बहुत तीव्रता से वृद्धि होती है.

पुरुष में testes और दूसरी सेक्स (अन्तः स्रावी) ग्रन्थियां होती हैं जो एक विशेष प्रकार के हारमोंस समूह को पैदा करती हैं जिसे एनड्रोजेन्स (ANDROGENS) कहते हैं. पुरुषों में एनड्रोजेन्स (ANDROGENS) की मौजूदगी के कारण ही दाढ़ी मूंछे विकसित हो जाती हैं.

वहीँ स्त्री में ovaries और दूसरी सेक्स (अन्तः स्रावी) ग्रन्थियां होती हैं जो एक दुसरे प्रकार के हारमोंस के समूह को पैदा करती हैं जिसे एस्ट्रोजेन्स (ESTROGENS) कहते हैं.

पुरुष में बनने वाले हारमोंस समूह एनड्रोजेन्स (ANDROGENS) उसके द्वितीयक सेक्स लक्षण जैसे आवाज़ में भारीपन और केश वृद्धि आदि को विनियमित करते हैं. वही स्त्री में बनने वाले हारमोंस समूह एस्ट्रोजेंस (ESTROGENS) उसके द्वितीयक सेक्स लक्षण जैसे स्तन-आकार में वृद्धि, जघन केश व मासिक धर्म चक्र के निर्धारण आदि को विनियमित करता है.

वास्तव में इन्ही हारमोंस के चलते स्त्री व पुरुष में कई प्रकार की शारीरिक विभिन्नताएं पाई जाती हैं. मसलन औरतों का जिस्म कोमल, नरम व नाज़ुक रहता है वहीँ मर्दों का जिस्म सख्त व मज़बूत हो जाता है.

तो अब आपको मालूम चल ही गया होगा कि स्त्री में एनड्रोजेन्स (ANDROGENS) की ग़ैर- मौजूदगी के कारण ही दाढ़ी मूंछ नहीं निकलती! लेकिन अगर उनको भी दाढ़ी-मूछें निकल गयी होतीं, तो?
 चित्र साभार गूगल


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ग़ैब से चलने लगी जब एक ज़हरीली हवा!

ग़ैब से चलने लगी जब एक ज़हरीली हवा और रोज़ उसे 20,000 लीटर पीते चले गए! जी हाँ, एक औसत व्यक्ति हर रोज़ लगभग 20,000 लीटर हवा ग्रहण करता है. हर उस पल जब हम सांस लेते हैं, ज़हरीले और ख़तरनाक रसायनों के साँस के दौरान शरीर के अन्दर जाने का ख़तरा रहता है जो कि विभिन्न कारणों व माध्यमों से वायु में मौजूद रहते हैं. वायु में इन ख़तरनाक रसायनों अथवा पदार्थों की मौजूदगी ही उसे दूषित करती है जिसके कारण "वायु प्रदुषण" अर्थात Air pollution होता है. ये ख़तरनाक पदार्थ ज़्यादातर गैस की अवस्था में होते है, परन्तु कहीं कहीं ये सूक्ष्म कण के रूप में भी मौजूद होते हैं. घर में या बाहर, वायु प्रदुषण कहीं भी हो सकता है. कारखानों, गाड़िओं आदि से निकलने वाली ज़हरीली गैसें नाइत्रोज़न ओक्साइड, कार्बन मोनोओक्साइड और विभिन्न प्रकार के कार्बनिक यौगिक जो कि भांप की शक्ल में आकर हवा में आसानी से मिल जाते हैं. जिसके कारण वायु प्रदूषित हो जाती है.
निम्न चित्र के माध्यम से हम वायु प्रदुषण के कारण व इसके दुष्प्रभावों को आसानी से समझ सकते हैं.

(चित्र पर चटका लगाकर इसे और बड़ा करें)

प्राकृतिक व मानवीय दोनों ही वायु प्रदुषण के लिए ज़िम्मेदार हैं बल्कि अतिश्योक्ति न होगी अगर हम कहें कि प्राकृतिक कारणों के अपेक्षा मानवीय कारणों से वायु प्रदुषण अधिक होता है. यह समस्या हमारे संसार के लिए नयी नहीं है बल्कि यह तो प्राचीन काल से हमारे लिए चुनौती है. पर्यावरणविद्दों को कई ऐसे सबूत मिले हैं जिससे यह साबित होता है कि प्राचीन समय में भी मनुष्य इस ज़हरीली हवा की चपेट में था. लेकिन अफ़सोस कि मानव मात्र की भौतिकवादिता इस क़दर संवेदनहीन हो चुकी है कि वह वर्तमान के लाभ के लिए भविष्य को और अँधेरे में धकेलता जा रहा है, वह यह नहीं सोच रहा कि कल उसकी ही संतान उसके दुष्कृत्य की बहुत ही भयानक सज़ा भुगतेगी. क्या इस सवाल का जवाब 'हां' में नहीं होगा कि हमारे पूर्वज भी ऐसा दुश्क्रिय कर चुके है जिसकी विरासत को हम इतनी तेज़ी से आगे बाधा रहें हैं?

वायु प्रदुषण के दुष्प्रभाव नाना प्रकार के हो सकते है. यह हमारे शरीर के श्वास अंगों पर बहुत बुरा प्रभाव डालते हैं और हमारे स्वास्थ्य के लिए अति हानिकारक होते हैं. यही नहीं यह पुरे पारिस्थिकीय तंत्र में भी फ़ेरबदल कर डालते हैं और इन सबकी वजह सिर्फ हम इंसान हैं.

वायु प्रदुषण बहुत ही आसानी से फैलता है क्यूंकि इसका माध्यम वायु है जो कि पूरे पर्यावरण में बहुत आसानी से विचरित होती है. अगर हम आंकड़ों और हकीकत पर अपने नज़र दौडाएं तो हमें पता चलता है कि दुनियां के कई ऐसे शहर है जहाँ इंसान शुद्ध हवा के बजाये ज़हरीला धुवां पीता है. दुनियां के 20 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में अकेले चीन के 16 शहर हैं और भारत चीन के पड़ोस में ही स्थित है. भारत में सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में लखनऊ का नंबर  चौथा है. जबकि मुंबई 40वें स्थान पर है. 

हमें व्यक्तिगत स्तर पर हर संभव कोशिश करनी होगी कि हम इस ज़हरीली हवा के उत्पादन के हिस्सा न बने. हमें वायु प्रदूषण के भयावह प्रसार को रोकना होगा. हम यह कह कर अपना पल्ला नहीं झाड सकते कि यह काम सरकार का है. यह समस्या सरकार की नहीं पुरे विश्व की है. कई देश इस प्रदुषण के लिए दुसरे देशों पर तोहमत देते रहते हैं और स्वयं इस के उपाय के लिए चिंतित नहीं रहते हैं.

यह जल प्रदुषण, ग्लोबल वार्मिंग की तरह एक वैश्विक समस्या है. हमें तोहमत लगाने की अपेक्षा एकसाथ मिलकर इस समस्या का हल ढूँढना होगा!

मैं आपसे पूछता हूँ क्या आप इस पहल का हिस्सा बनने के लिए  तैयार हैं !!!???
-सलीम ख़ान
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सन 2030 तक पीने के शुद्ध पानी की मात्रा कितनी रह जाएगी!

मानव द्वारा की जा रही अप्राकृतिक गतिविधियों के कारण बढ़ते जल प्रदुषण से जल निकायों (नदियों, झीलों, समुद्रों और भूगर्भीय जल) पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है और अगर इंसान इसी तरह अपने नितांत निजी फ़ायदों और सिर्फ़ वर्तमान लाभों की पूर्ति हेतु अपना यह दुष्कृत्य करता रहेगा तो वह दिन दूर नहीं जब इस पृथ्वी पर पेय जल के प्राकृतिक स्रोत अपना मूलभूत अस्तित्व खो देंगे. ज़रा सोचिये ! अगर ऐसा हुआ तो हमारे पास इस क्या समाधान होगा? मैंने इस बारे में कुछ लोगों से बात की तो पाया कि कुछ इस मसले पर वाक़ई गंभीर थे और उन्होंने यह अहद (प्रण) लिया कि वे भविष्य में अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करेंगे कि जल-प्रदुषण न हो वहीँ कुछ ने जल प्रदुषण के समाधान के तौर आधुनिक होते विज्ञान के अविष्कार की तरफ़ तवज्जोह दिलाई और जल प्रदुषण पर किसी भी तरह की चिंता से इन्कार किया. उनका तर्क था कि यदि विज्ञान पानी के विकल्प के रूप मे कुछ खोज ले तो ये एक सकारात्मक दृष्टिकोण होगा क्यूंकि निरंतर तेज़ी से बढ़ते वैज्ञानिक आविष्कारों को देखते हुए यह कोई मुश्किल काम नहीं!!


क्या मानव की यह सोच सही है, अगर हाँ तो यह सोच मानव के लिए खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने के बराबर है. मिसाल के तौर पर एक व्यक्ति एक सामान को तोड़ रहा है और उससे जब पूछा जाता है कि भैया ! ऐसा क्यूँ कर रहे हो? सामान को तोड़ोगे तो तुन्हें कितना नुक्सान हो जायेगा? तो प्रत्युत्तर में वह कहता है कि "कोई चिंता नहीं है मैं इस के विकल्प में दूसरा सामान क्रय कर लूँगा!" वैसे तो यह तर्क सामान्य सा है लेकिन क्या यह तर्क किसी समस्या के वृहद् रूप में कारगर साबित हो सकता है? तो मेरा जवाब है"नहीं"!!!


मानव द्वारा की जा रही अप्राकृतिक करतूतों का खामियाज़ा सिर्फ़ जल संकट ही पैदा नहीं कर रहा है बल्कि ज्वालामुखी, सुनामी अथवा कटरीना जैसे तूफ़ान और ज़लज़ले (भूकंप) को भी असमय विनाश की दावत दे रहें हैं. उधर जल की गुणवत्ता, जल की पारिस्थितिकीय स्थिति में तब्दीली को जल प्रदुषण के रूप में नहीं देखा जा रहा है!


जल प्रदुषण के कई कारण हैं. जैविक अपशिष्ट पदार्थ इनमें से एक है. जल प्रदुषण ही नहीं पूरी पारिस्थितिकी प्रणाली पर जैविक अपशिष्ट पदार्थों ने प्रतिकूल प्रभाव किया है जैसे मल-विसर्जन, कृषिकीय अपशिष्ट पदार्थ आदि. जिसके कारण जल में ओक्सीज़न की मात्रा में कमीं आती है. उद्योग कचरा जैसे भारी धातु, कार्बनिक ज़हर, तेल, खाद्य पदार्थ, पोषक तत्व व ठोस पदार्थों आदि का 'विसर्जन' भी जल प्रदुषण में अपनी करामात दिखा रहा है. 

अपशिष्ट पदार्थ की वजह से सिर्फ़ जल प्रदुषण ही नहीं  हो रहा है बल्कि ओक्सीज़न की मात्रा में भी कमी हो रही है एवम ग्लोबल वार्मिंग में भी इज़ाफा हो रहा है. एक आकंडे के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग की यह गति जारी रही तो सन 2030 तक इतनी गर्मी पढेगी जो हम मानव सह नहीं सकेंगे.

तो आईये हम सभी मिल कर आज से यह संकल्प लें कि हम पूरी कोशिश करें कि हमारे हाथों आज से किसी भी प्रकार का जल प्रदुषण नहीं होगा और हम इसके रोकथाम के लिए भरकस कोशिश करें!
अगले अंक में पढ़ें क्या होगा सन 2070 में, जब पीने योग्य पानी न होगा !
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वो आसमान से मौत बनके बरसेगी: 'अम्ल वर्षा'

लोककथाओं में ही नहीं अनेक किवदंतियों में भी आसमान से ईश्वर का क़हर बरसने के किस्से प्राचीन काल से चले आ रहे हैं। हालाँकि इन कथाओं को हमेशा शक की निगाह से देखा जाता रहा है, लेकिन आज के घोर वैज्ञानिक युग में भी कुछ ऐसे हालात बन रहे हैं, कि लोक कथाओं के वह किस्से हमें सच होने जैसे लग रहे हैं। बढ़ते औद्योगिक प्रदूषण के कारण हमारे वायुमण्डल में 'अम्ल वर्षा' की संभावनाएं प्रबल होती जा रही हैं। यह अम्ल वर्षा किन्हीं मामलों में ईश्वरीय कहर से कम नहीं। यह क्या है और इसके पीछे क्या कारण हैं?

'अम्ल वर्षा' को अंग्रेज़ी में 'acid rain' कहते हैं. जैसा कि नाम से ही लग रहा है कि यह किसी प्रकार की वर्षा है जो अम्लीय होगी. गाड़ी, औद्योगिक उत्पादन आदि के प्रक्रिया के उपरान्त निकली ज़हरीली गैसें (सल्फर-डाई- ओक्साईड और नाइत्रोज़न ओक्साईड) जो कि ऊपर बारिश के पानी से मिल कर अम्लीय अवस्था में आ जाती हैं. वह वर्षा जिसके पानी में यह गैस मिल जाती है अम्ल वर्षा कहलाती है.

ज़हरीली गैसों के अम्लीय अवस्था तक का ख़तरनाक सफ़र
(ज़हरीली गैस + जल = अम्ल)
इसका वैज्ञानिक सूत्र इस प्रकार है:-
SO2 + H2O = H2SO4 (Sulfuric Acid)
NOx + H2O = HNOx (Nitric Acid)

निम्न चित्र के माध्यम से हम अम्ल वर्षा को समझ सकते हैं.


अम्ल वर्षा हमारे लिए पर्यावरण सम्बन्धी मौजूदा समस्याओं में से एक सबसे बड़ी समस्या है. यह अदृश्य गैसों से निर्मित होती है जो कि आम तौर पर ऑटोमोबाइल या कोयला या जल विद्धुत संयंत्रों के कारण वातावरण में बनतीं है. यह अत्यंत विनाशकारी होती है.


वैज्ञानिकों ने इसके बारे में सबसे पहले सन 1852 में जाना. एक अँगरेज़ वैज्ञानिक रॉबर्ट एग्नस (Robert Agnus) ने अम्ल वर्षा के बारे सबसे पहले इसे परिभाषित किया और इसके कारण और विशेषताओं की व्याख्या की. तब से अब तक, अम्ल वर्षा के वैज्ञानिकों और वैश्विक नीति-निर्माताओं के बीच तीव्र बहस का एक मुद्दा रहा है.

अम्ल वर्षा अति-प्रदूषित इलाक़े में बड़ी दूर तक बड़ी आसानी से फैलती है. यही वजह है कि यह एक वैश्विक प्रदूषण समस्या है. जिसके लिए विभिन्न देश एक दुसरे पर तोहमत लगाते हैं. जबकि कोई भी इसके प्रति उतना गंभीर नहीं है जितनी तेज़ी से यह समस्या बढ़ रही है. पिछले कुछ सालों में विज्ञान ने अम्ल वर्षा के मूलभूत कारणों को जानने की कोशिश कि तो कुछ वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला है कि मानवीय उत्पादन मुख्य रूप से जिम्मेदार है तो वही कुछ वैज्ञानिकों ने इस समस्या का ज़िम्मेदार प्राकृतिक कारणों को माना. वस्तुतः सभी देशों को अम्ल वर्षा के कारणों और उसके दुष्प्रभावों के प्रति सजग रहना होगा.
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