यह मंच है विज्ञान का, यहाँ होगा विज्ञान का संवाद और संचार ब्लॉग के जरिये और होगीं विज्ञान और टेक्नोलॉजी की बातें, जन जन के लिए, आम और खास के लिए भी! आप सभी का स्वागत है!
जुड़ने के लिए संपर्क करे +91 9838659380 (सलीम ख़ान)
News Update :

ग़ैब से चलने लगी जब एक ज़हरीली हवा!

ग़ैब से चलने लगी जब एक ज़हरीली हवा और रोज़ उसे 20,000 लीटर पीते चले गए! जी हाँ, एक औसत व्यक्ति हर रोज़ लगभग 20,000 लीटर हवा ग्रहण करता है. हर उस पल जब हम सांस लेते हैं, ज़हरीले और ख़तरनाक रसायनों के साँस के दौरान शरीर के अन्दर जाने का ख़तरा रहता है जो कि विभिन्न कारणों व माध्यमों से वायु में मौजूद रहते हैं. वायु में इन ख़तरनाक रसायनों अथवा पदार्थों की मौजूदगी ही उसे दूषित करती है जिसके कारण "वायु प्रदुषण" अर्थात Air pollution होता है. ये ख़तरनाक पदार्थ ज़्यादातर गैस की अवस्था में होते है, परन्तु कहीं कहीं ये सूक्ष्म कण के रूप में भी मौजूद होते हैं. घर में या बाहर, वायु प्रदुषण कहीं भी हो सकता है. कारखानों, गाड़िओं आदि से निकलने वाली ज़हरीली गैसें नाइत्रोज़न ओक्साइड, कार्बन मोनोओक्साइड और विभिन्न प्रकार के कार्बनिक यौगिक जो कि भांप की शक्ल में आकर हवा में आसानी से मिल जाते हैं. जिसके कारण वायु प्रदूषित हो जाती है.
निम्न चित्र के माध्यम से हम वायु प्रदुषण के कारण व इसके दुष्प्रभावों को आसानी से समझ सकते हैं.

(चित्र पर चटका लगाकर इसे और बड़ा करें)

प्राकृतिक व मानवीय दोनों ही वायु प्रदुषण के लिए ज़िम्मेदार हैं बल्कि अतिश्योक्ति न होगी अगर हम कहें कि प्राकृतिक कारणों के अपेक्षा मानवीय कारणों से वायु प्रदुषण अधिक होता है. यह समस्या हमारे संसार के लिए नयी नहीं है बल्कि यह तो प्राचीन काल से हमारे लिए चुनौती है. पर्यावरणविद्दों को कई ऐसे सबूत मिले हैं जिससे यह साबित होता है कि प्राचीन समय में भी मनुष्य इस ज़हरीली हवा की चपेट में था. लेकिन अफ़सोस कि मानव मात्र की भौतिकवादिता इस क़दर संवेदनहीन हो चुकी है कि वह वर्तमान के लाभ के लिए भविष्य को और अँधेरे में धकेलता जा रहा है, वह यह नहीं सोच रहा कि कल उसकी ही संतान उसके दुष्कृत्य की बहुत ही भयानक सज़ा भुगतेगी. क्या इस सवाल का जवाब 'हां' में नहीं होगा कि हमारे पूर्वज भी ऐसा दुश्क्रिय कर चुके है जिसकी विरासत को हम इतनी तेज़ी से आगे बाधा रहें हैं?

वायु प्रदुषण के दुष्प्रभाव नाना प्रकार के हो सकते है. यह हमारे शरीर के श्वास अंगों पर बहुत बुरा प्रभाव डालते हैं और हमारे स्वास्थ्य के लिए अति हानिकारक होते हैं. यही नहीं यह पुरे पारिस्थिकीय तंत्र में भी फ़ेरबदल कर डालते हैं और इन सबकी वजह सिर्फ हम इंसान हैं.

वायु प्रदुषण बहुत ही आसानी से फैलता है क्यूंकि इसका माध्यम वायु है जो कि पूरे पर्यावरण में बहुत आसानी से विचरित होती है. अगर हम आंकड़ों और हकीकत पर अपने नज़र दौडाएं तो हमें पता चलता है कि दुनियां के कई ऐसे शहर है जहाँ इंसान शुद्ध हवा के बजाये ज़हरीला धुवां पीता है. दुनियां के 20 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में अकेले चीन के 16 शहर हैं और भारत चीन के पड़ोस में ही स्थित है. भारत में सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में लखनऊ का नंबर  चौथा है. जबकि मुंबई 40वें स्थान पर है

हमें व्यक्तिगत स्तर पर हर संभव कोशिश करनी होगी कि हम इस ज़हरीली हवा के उत्पादन के हिस्सा न बने. हमें वायु प्रदूषण के भयावह प्रसार को रोकना होगा. हम यह कह कर अपना पल्ला नहीं झाड सकते कि यह काम सरकार का है. यह समस्या सरकार की नहीं पुरे विश्व की है. कई देश इस प्रदुषण के लिए दुसरे देशों पर तोहमत देते रहते हैं और स्वयं इस के उपाय के लिए चिंतित नहीं रहते हैं.

यह जल प्रदुषण, ग्लोबल वार्मिंग की तरह एक वैश्विक समस्या है. हमें तोहमत लगाने की अपेक्षा एकसाथ मिलकर इस समस्या का हल ढूँढना होगा!

मैं आपसे पूछता हूँ क्या आप इस पहल का हिस्सा बनने के लिए  तैयार हैं !!!???
-सलीम ख़ान
Share this article :

+ comments + 1 comments

19 जनवरी 2010 को 6:27 pm

vigyaan kee itni saari gyan kee baatein... bhayi cigrrette ke dhuon se to main bhi pradushan badhane mein barabar ka yogdata hun... par prayaas karunga apni taraf se ise kam kar sakun... saleem bhayi ko mera salaam... waise to sahitiyik vyakti hun par aaj vigyaan kee bhasha bhi samajh gaya...

एक टिप्पणी भेजें

 
Design Template by panjz-online | Support by creating website | Powered by Blogger