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Saleem Khan

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गौ-रक्षा के लिए पॉलीथीन का प्रयोग बिल्कुल ना करें.

सलीम ख़ान
सिर्फ़ आप ही नहीं, गाय भी पॉलीथीन के कारण जोखिम में हैं. हम अपने लिए भी और गाय की रक्षा के लिए आज ही से पॉलीथीन को 'ना' बोलें ! पॉलीथीन का ना तो प्रयोग करें और न ही इसके प्रसार में तनिक भी सहयोग दें !! अगर दुकानदार आपको पॉलीबैग में सामान दे तो उसे नकार दीजिये और कहें कि पेपर बैग में दे बल्कि सबसे बेहतरीन तो यही होगा कि आप स्वयं एक थैला लेकर जाएँ. आप थैला ले जाने वाली प्रवृत्ति को सौ प्रतिशत तक आत्मसात कर लें. ये बेहतर रहेगा और प्राथमिक तौर पर आप पॉलीथीन को नकारने वाले कहलायेंगे. विचारधारा को बदलें, वो अपनाएँ जो सिर्फ़ आपके लिए हितकारी ना हो बल्कि पूरे समाज और पूरी दुनियाँ के लिए हितकारी हो...! आज आप पाठक-गण को पॉलीथीन और उसके प्रयोग से होने वाले दुष्प्रभावों, उससे बचने के उपायों  के बारे में विस्तृत रूप से बताता हूँ. 

आजकल, हर रोज़ हजारों नए उत्पाद बाज़ार में अवतरित हो रहें हैं. उन्ही में से एक उत्पाद है पॉलीथीन बैग का. पॉलीथीन बैग तो हमारी-आपकी ज़िन्दगी में इतना आम हो चुका है कि यह हमारे दैनिक जीवन का एक अहम हिस्सा बन चुका है. विकसित होने की चाह ने हमें इस क़दर निर्दयी बना दिया है कि हम अपनी ख़ूबसूरत धरती को नष्ट करने पर तुले हुए हैं. आधुनिक औद्योगीकरण में प्लास्टिक निर्मित वस्तुओं से बाज़ार पटा पड़ा हुआ है. प्लास्टिक उद्योग की शुरुआत सन 1860 के आसपास हुई थी, जब प्लास्टिक की एक लहर सी आई और कहा जाने लगा कि प्लास्टिक युग आ गया है और अब हम प्लास्टिक युग में जीने जा रहें हैं.

पॉलीथीन बैग्स एक प्लास्टिक निर्मित वस्तु होती है. पेपर और जूट निर्मित पारंपरिक बैग के मुक़ाबले पॉलीबैग के फ़ायदे गिनाये जाते हैं और यह सत्य भी है कि पॉलीबैग, पेपर बैग या जूट बैग के मुक़ाबले कम जगह लेते हैं, वाटर-प्रूफ होते हैं और ज़्यादा मज़बूत होते हैं. पॉलीबैग जल्दी फटते नहीं हैं, द्रव पदार्थ को भी इसमें रखा जा सकता है, जबकि पेपर बैग में यह संभव नहीं है. इन्ही चन्द फ़ायदे के चलते प्लास्टिक बैग की मांग बढ़ती ही चली गयी.





पॉलीथीन व प्लास्टिक: एक संक्षिप परिचय


पॉलीथीन उच्च आणविक भार सहित एथिलीन का एक बहुलक है. जब इसे गर्म किया जाता है तो यह मुलायम हो जाता है और ठंडा होने पर यह वापिस कड़ा हो जाता है. पॉलीथीन एक प्लास्टिक उत्पाद है. प्लास्टिक शब्द ग्रीक भाषा के 'प्लास्टिकोज़' से बना है जिसका अर्थ होता है 'ढलाई के लिए सर्वथा उपयुक्त' एवम रासायनिक भाषा में. प्लास्टिक एक बहुमुखी वस्तु है. यह हल्का, लचीला, नमीं प्रधिरोधी, टिकाऊ, मज़बूत, अपारदर्शी होता है. यही विशेषताएं ही इसकी सबसे बड़ी ख़ामियाँ भी है.


पॉलीथीन: एक भयानक ख़तरा
उपरोक्त विश्लेषण से एक बात तो सामने आ जाती है कि प्लास्टिक बैग ज़्यादा टिकाऊ होते हैं और इसी विशेषता के कारण पर्यावरणविद्दों के माथे पर परेशानियों की लकीरें आने लगी हैं. यह इतना ज़्यादा टिकाऊ होता है कि नष्ट होने में लगभग सवा लाख साल लग जाता है. प्लास्टिक से निर्मित वस्तुएं हमें यत्र-तत्र-सर्वत्र मिल जाती हैं. बाज़ार की हर एक दूकान में, शहर के हर एक घर में, कूड़ेघर के ढेर में, गटर में यहाँ तक कि सीवर लाइंस में भी ! यही वजह है कि बरसात के मौसम में गंदे पानी के ओवरफ्लो की वजह से शहर की गालियाँ और घर तक भर जाते हैं. यही गंदा पानी बिमारी की जड़ बन जाता है और कीटाणुओं और जीवाणुओं के बढ़ जाने का ख़तरा बढ़ जाता है.

पॉलीथीन को खाती गायें
इतना कुछ होने के बावजूद प्लास्टिक और इससे निर्मित वस्तुएं हमारी ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा बन चुकी है, प्लास्टिक हमारी ज़िन्दगी में इतनी महत्वपूर्ण और व्यावहारिक हो चुकी है कि यह दोस्त बन-बन के हमें मिटा रही है. अब तो इसको नियंत्रित करने और समाप्त करने के लाले आ गये हैं. अविघटित स्वभाव होने की वजह से आसानी से विघटित भी नहीं किया जा सकता है. विघटित करने के प्रयास में इससे ज़हरीली गैस निकलती है जो पर्यावरण में बहुत बड़ी मात्रा में प्रदुषण करने में दुश्सहायक होती है. ज़हरीली गैसें पर्यावरण में मिलकर क्लोरीनेटेड यौगिक बनाती हैं जिसकी चपेट में आने पर त्वचा सम्बन्धी रोग एवम कैंसर हो सकता है. भारत में गाय और दुसरे खुले जानवर जो भोजन की तलाश में कूड़े में पड़े पॉलीबैग को खोलने के प्रयास करते हुए बैग को ही ख़ा जाते हैं, जिससे उनकी पाचन प्रणाली बन्द हो सकती है जो उनकी मृत्यु के कारण तक बन सकती हैं. वहीँ जल-निकायों (जलाशय, झील, नदी आदि) में जल-प्राणी जैसे मछली आदि पॉलीथीन को खा लेतीं है जिससे उनकी भी मौत हो जाती है.

पर्यावरण जागरूकता
खुला कचरा
इस तरह से पॉलीथीन जैविक और अजैविक वातावरण के लिए एक भयानक ख़तरा है. दुनियाँ भर के वैज्ञानिक और सामाजिक संस्थाएं इसके प्रति लगातार हमें चेता रहें हैं. वे हमें लगातार आगाह कर रहे है कि पॉलीथीन द्वारा हमें नुकसान पहुँच रहा है जिससे कई बीमारियाँ हो रही हैं. हालाँकि अज्ञानता, निरक्षरता, आम-जन की ग़रीबी भी इसका एक मूल कारण है. कूड़े में कई तरह के कचरे आपस में मिलकर नयी तरह की ज़हरीली गैसे और यौगिक बना डालते हैं. आम-जन को यह इल्म देना बहुत ज़रूरी है कि वह कूड़े-कचरे को किस तरह से व्यवस्थित करे. अलग-अलग तरह के कूड़े के लिए अलग-अलग व्यवस्था हो तो बेहतर होगा; जैसे- रसोई कचरा, कांच, प्लास्टिक, धातु, बैटरीज आदि. पर्यावरण सुरक्षा के दृष्टिगत हमें पॉलीबैग के प्रयोग में कटौती करनी चाहिए और काग़ज़, कपड़े और जुट के बैग के प्रयोग को बढ़ावा देना चाहिए.

पृथ्वी अब थक चुकी है ! वह हमें वही सब चीज़ें वापस कर रही है जो हमने उसे दिया ! यह समय उपयुक्त है, अभी इसी वक़्त हम सचेत हो जाएँ, कहीं देर ना हो जाए ! हम प्रण करें कि प्रयावरण के प्रति जितना भी हो सकेगा सचेत रहेंगे !! हम हमेशा एक बात का ध्यान रखें कि 'पृथ्वी जैसी अनमोल धरोहर को हमने अपने पूर्वजों से अपने लिए नहीं बल्कि अपने बच्चो को देने के लिए लिया है', वो भी ऐज़ इट इज़ !
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ये गया यारों इसको....'मलेरिया' हुआ...!!!

आप क्या समझते हैं कि आतंक सिर्फ़ आतंकवादी ही फैलाते हैं, अरे भाई ! अगर आपको यही लगता है तो सुधार कर लीजिये अपनी सोच पर ! आतंक आजकल कोई और भी फैला रहा है... ! जी हाँ, आप सही समझे... मच्छर ! आज मैं आपको बताऊंगा कि कैसे इस बरसात के मौसम में मच्छरों ने इंसानों को हिजड़ा बना डाला. दो मिलीग्राम से भी कम भार वाले इस जीव ने 80-90 किलोग्राम के इन्सान का जीना हराम किया हुआ है. 

इस बारिश में डेंगू और मलेरिया का प्रकोप अपने चरम सीमा पर पहुँच चुका है. दिल्ली और लखनऊ जैसे महानगरों और नगरों में मलेरिया और डेंगू के मरीज़ की संख्या में लगातार इज़ाफा होता जा रहा है. कहते हैं कि मच्छर पीढ़ी-दर-पीढ़ी समझदार होते जा रहें, अगर इस साल आपने उनके लिए कोई इलाज़ तजवीज़ किया तो अगले साल उनमें उस इलाज़ का कोई असर नहीं होता और अपने आतंक का परचम वह लहराने लगते हैं. इन्सान के पास जो भी कारगर उपाय होता है वह धरा का धरा रह जाता है.

पहले तो मलेरिया था फ़िर आया डेंगू. अभी चिकनगुनियाँ आया...चिकनगुनियाँ के वाहक मच्छर तो साफ़ पानी में होते है और रात में ही नहीं दिन में काटते हैं! ज़्यादा कुछ नहीं लेकिन मच्छर द्वारा फ़ैलाये जा रहे रोगों और उसके लिए किये जा सकने वाले उपायों का ज़िक्र हम यहाँ करेंगे! 

केवल मादा मच्छर ही इन्सान को काटती है, इस बात का खुलासा वैज्ञानिक रोनाल्ड रॉस ने किया था. बाद में और भी रिसर्च हुए और पता चला कि मच्छर तो निमित्त मात्र है, वह तो केवल वाहक है... इलज़ाम तो किसी और के कारण है मच्छर पर...! किसी इन्सान को जब मच्छर ने काटा तो मच्छर में स्थित परजीवी इन्सान के खून में आ जाता है और जब उसी इन्सान को कोई दूसरा मच्छर काटता है तो वही परजीवी उस मच्छर में पहुँच जाता है.

सावधानी ही बेहतर इलाज़ होता है इसलिए संक्षेप में जान लें कि कौन-कौन से उपाय है जो इससे निजात पाने में सहायक होते हैं:::
  • बदन को खुला ना छोड़ें. पूरी बाजू के कपड़े पहनने की कोशिश करें.
  • मच्छर मारने की दवा का इस्तेमाल करें.
  • डेंगू होने पर बुख़ार में एसिटामिनोफेन लेना चाहिए.
  • डेंगू में एस्पिरीन और आईब्रुफिन नहीं लेना चाहिए.
  • बच्चों को तो डाक्टर की सलाह पर ही कुछ देना चाहिए.
  • आराम खूब करना चाहिए.
  • तरल पदार्थ इस्तेमाल करना चाहिए.
  • डेंगू में हालत ख़राब होने पर बुख़ार आता है और तेज़ दर्द होता है.
  • ऐसे बुखार में भूल कर भी घरेलू टोटके नहीं करने च्चिये.
  • हाँ, पैरासिटामाल ले सकते हैं.
  • उल्टियाँ, चिडचिडापन, सुस्ती, भ्रम जैसे कैफ़ियत भी होती है.
  • मरीज को फ़ौरन ही हॉस्पिटल में एडमिट करके ग्लूकोज़ चढ़वाइए.
-सलीम ख़ान  
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आ...छीं, आ...छीं ! कैसे बचे ज़ुकाम से, इस मौसम में !

जकल जैसा मौसम है उसमें ज़ुकाम के हो जाने का ख़तरा बना रहता है. मुझे तो ज़ुकाम ने ऐसा पकड़ा कि पूछिये मत ! ईद की छुट्टी की वाट लगा दी ये तो गनीमत थी कि मैंने कण्ट्रोल कर लिया. इस गर्मी में बदलते हुए मौसम में ठन्डे पानी का सेवन तो ऐसे है जैसे शादी का लड्डू. जैसे शादी का लड्डू जो खाता है वह भी पछताता है और जो नहीं खाता है वह भी. ठीक उसी तरह से जो बदलते मौसम में ठंडा पानी पीने वाले की ख़ैर नहीं और जो डर से ना पीये उसको भी ख़ैर ना महसूस हो. इसी दरमियान मैंने जानने की कोशिश की कि ज़ुकाम को समय रहते कैसे कण्ट्रोल किया जा सकता है? ज़ुकाम होने के कौन-कौन से कारण हैं? क्या करें और क्या ना करें? वगैरह वगैरह...

ज़ुकाम आख़िर होता क्यूँ है?
ज़ुकाम को अगर हम साधारण रूप से परिभाषित करे तो कहेंगे कि यह नाक और साँस-तंत्र में होने वाला संक्रमण है. ज़ुकाम होने की मुख्य पहचान 'नाक बहने या बन्द होने से' होती है. नाक बन्द होना या बहना वाइरस के कारण होता है. 'कोराना, एडेनो, राईनो' जैसे वाइरस इसके वाहक हैं. ज़ुकाम होने के लक्षण में कई मर्तबा आपको शरीर में बहुत ज़्यादा दर्द और सुखी खाँसी की समस्या भी हो सकती है जो कि 4-5 दिन से 8-9 दिन तक रहती है. अक्सर लोग ज़ुकाम हो जाने पर ढीला-ढाला रवैया अख्तियार करतें है जिसकी वजह से यह बीमारी को और भी अधिक बढ़ा सकता है.

ज़ुकाम कब होता है?
ज़्यादातर बदलते मौसम में ज़ुकाम होता है क्यूंकि बदलते मौसम में हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर पड़ जाती है. यही वजह है कि सर्दियों में जब अचानक तापमान कम होने लगता है तो ज़ुकाम पकड़ लेता है और वहीँ गर्मियों के बाद बरसात में भी ज़ुकाम पकड़ लेता है. गर्मियों के बाद बरसात में अक्सर हम एयर कंडीशन से धुप में, धुप से एयर कंडीशन में जाने से हमारे शरीर का तापमान में अचानक गिरावट आ जाती और यही सबसे बड़ी वजह है ज़ुकाम की. शरीर के तापमान में अचानक  गिरावट से हमारा शरीर होने वाले संक्रमण से लड़ने के लिए अक्सर तैयार नहीं हो पाता है.

ज़ुकाम की रोकथाम, कैसे?
ज़ुकाम की रोकथाम के लिए कुछ सावधानियां कर लेने से बचाव किया जा सकता है:

  • अचानक गरम से ठन्डे और ठन्डे से गरम माहौल में ना जाए.
  • पसीना आने के फ़ौरन बाद अथवा दौड़-धूप/खेलने के फ़ौरन बाद ठंडा पानी बिल्कुल ना पीयें.
  • गरम खाना ख़ा लेने के उपरान्त ठंडा खाना ना खाएं.
  • मौसम के लिहाज़ से कपडे पहने.
  • धूल भरे माहौल से बचें और ऐसे में नाक को कपड़ें से ढक लें.
  • अपने शरीर को यथा-संभव स्वच्छ रखें.
  • हाथों को धोते रहें, जब भी गंदे हों क्यूंकि ज़्यादातर ज़ुकाम अशुद्ध हांथों से भी होता है.
  • सार्वजनिक चीज़ों जैसे करेंसी-नोट, दूसरों के पेन, कागज़ वगैरह के प्रयोग में सावधानियां बरतें.
  • अपने साथ हर वक़्त रुमाल आदि लेकर चलें.
  • सुबह में ताज़ी हवा का सेवन करने की कोशिश करें, दिन में भी ताज़ी हवा लें.
  • भीड़ भरे स्थान और धूल भरे माहौल से बचें.
  • पौष्टिक और पोशाक भोजन का ही सेवन करें, मौसम के लिहाज़ से भोजन करें. कोशिश करें कि भोजन में हरी सब्जियां ज़रूर हो.
  • वो खनिज़ और विटामिन भरी चीज़ें खाएं जिनमें रोग प्रतिरोधक तत्व मौजूद हों.
  • खूब तरलता भरा भोजन करें, रेशेदार फ़ल और सब्जियों का इस्तेमाल करें.
  • ज़ुकाम-ग्रस्त लोगों से दूरी बनायें रखें.
फ्लू और ज़ुकाम में फ़र्क़
अक्सर लोग फ्लू और ज़ुकाम में फ़र्क़ नहीं जान पाते हैं और फ्लू को ज़ुकाम समझने की भूल कर बैठते हैं जबकि दोनों में फ़र्क़ है. ज़ुकाम और फ्लू (इन्फ़्लुएन्ज़ा) के अंतर जो जानना बहुत ज़रूरी है. फ्लू इन्फ़्लुएन्ज़ा वाइरस से होता है जबकि ज़ुकाम के होने का अलग कारण है. दोनों बीमारियाँ एक दुसरे से मिलती ज़रूर है लेकिन उनको एक जैसा समझ लेना हमारी चूक होगी. फ्लू के दरमियान खूब तेज़ बुख़ार से सिर-दर्द, बदन-दर्द, सूखी-खाँसी और बेहद कमज़ोरी भी महसूस होती है.

-सलीम ख़ान  
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तरह-तरह के साँप (Different Types of Snake)




सावन के महीने में आईये जाने कुछ साँप के बारे में !  
शीर्षक और फ़ोटो देख कर डर तो नहीं लगा ! क्या कहा, ...लगा !? लगना भी चाहिए, साँप है ही ऐसे चीज़ ! ...अरे ...अरे ये क्या कर रहें है अपना पाँव ऊपर क्यूँ उठा लिया जनाब. घबराईये नहीं साँप आपके ऑफिस, साइबर कैफ़े में नहीं आएगा! वैसे सच कहूँ लिखते-लिखते मेरे भी रोगटे खड़े हो गए!!!!!!!! अरे मेरे क्या मैं तो कहता हूँ साँप का नाम सुनते ही सबके रोयें खड़े हो जाते हैं. अब ज़्यादा नहीं डरूंगा आई मीन डराउंगा. आता हूँ मुख्य मुद्दे पर...

दुनियाँ में मुख्तलिफ़ (विभिन्न) प्रकार के साँप पाए जाते हैं जिनमें से कुछ ज़हरीले होते है तो कुछ ज़हरीले नहीं होते हैं. पौराणिक विश्वास के अनुसार माना जाता है कि साँप दुनियाँ के सबसे पहले और सबसे पुराने सरीसृप हैं. आज मैं आपको इस आलेख में दुनियाँ भर में पाए जाने वाले साँपों के बारे में कम शब्दों में बताऊंगा, मैं बताऊंगा कि दुनियाँ में कितने प्रकार के साँप पाए जाते हैं. सामान्यतया साँप को एक बेहद ज़हरीला, विषैला और ख़तरनाक जन्तु माना जाता है जिसके काटने से फ़ौरन ही किसी की मौत हो जाती है. लोग साँप का नाम सुनते ही मन में एक विचार ले आते हैं कि साँप मृत्यु का दुसरा नाम है. जबकि ऐसा कदापि नहीं है, कुछ साँप बिल्कुल भी ज़हरीले नहीं होते हैं, बल्कि बहुत सीधे और शांत भी होते हैं.


वैसे अगर ज़हरीले साँपों का ज़िक्र किया जाये तो दुनियाँ में कुल चार तरह के ज़हरीले साँप होते हैं:- 1. एलापिड्स  2. वैपरिड्स 3. कोलुब्रिड्स 4. हाइड्रोफ़ाईडी (समुंद्री)

एलापिड्स परिवार के साँप दुनियाँ में उष्णकटिबंधीय अथवा अर्थ-उष्णकटिबंधीय इलाकों में पाए जाते हैं. इस परिवार में 231 जातियां होती है. कुछ एलापिड्स के सदस्यों का नाम इस प्रकार है: कोबरा, किंग कोबरा, करैत! सभी के सभी बेहद ज़हरीले होते हैं. दुनियाँ का सबसे ख़तरनाक ज़हरीला साँप काला माम्बा इसी परिवार का अभिन्न अंग है. 

वाइपर अथवा वाईपराइड्स पूरी दुनियाँ में पाए जाते है सिवाय ऑस्ट्रेलिया और मेडागास्कर. इनका मुहँ अपेक्षाकृत थोड़ा बड़ा होती है. जिससे ये शिकार को आसानी से बेहतर तरीके से पकड़ लेते हैं. इस परिवार में 4 जातियां होतीं हैं: आज़ेमिओपिनि (Azemiopinae), वाइपरनी (Vipernae ), क्रोटेलिनी (Crotalinae) और काउसिनी (Causinae).

कोलुब्रिड साँप कोलूब्रिडी परिवार से ताल्लुक़ रखते हैं. इनकी खासियत है कि इनका पूरा शरीर स्केल्स से ढंका होता है. सामान्यतः यह परिवार नुकसान-रहित है और इनमें ज़हर नहीं पाया जाता है लेकिन कुछ साँप इनमें ऐसे भी हैं जिनके नुकीले दांत उनके मुह के पीछे की तरफ़ होते हैं और वे नुकसान दायक होते हैं लेकिन वह केवल अफ्रीकन ही होते हैं.

इस परिवार के सदस्यों में कुछ साँप रानी साँप, राजा साँप, ताज साँप, बैल साँप, चूहा साँप, मोज़ाबंध साँप, चिकना साँप, पानी साँप, दुधहिया साँप, बेल साँप, पेड़ पर रहने वला साँप आदि हैं. रानी साँप (Queen Snaik) ज़हरीला नहीं होता है और यह 60 सेंटीमीटर से ज़्यादा लम्बा नहीं होता है. जैतूनी रंग और गहरे भूरे रंग के होते हैं.

समुद्री साँप में कई तरह की प्रजातियाँ होती हैं.वे ज़मीन की तुलना में पानी में ज़्यादा निवास करते हैं.समुंद्री साँप कोबरा समूह से सम्बंधित होता है. वे दो मीटर तक लम्बे होते हैं. इनके परिवार में पचास से ज़्यादा प्रजातियाँ होती है और जिनमें से अधिकतर ज़हरीली होती हैं. इनके उपरे जबड़े में अपेक्षाकृत छोटे, नुकीले और थोड़े खोखले दांत होते हैं. इनमें लगभग 1.5 मिलीग्राम तक ज़हर होता है.

समुंद्री साँप थलीय साँप की अपेक्षा ज़्यादा ज़हरीले होते हैं.
इति-श्री
 -सलीम ख़ान
साँपों के बारे में अन्य जानकारी के लिए देखें- सर्प संसार
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क्या स्तनपान कराने से महिला सौन्दर्य पर नकारात्मक असर पड़ता है?

इधर के वर्षों में यह आश्चर्यजनक रूप से देखने में आया है कि कुछ महिलाएँ अपनी फिगर के लिए बच्चों को स्तनपान कराने से परहेज करने लगी हैं। ऐसे में सवाल यही है कि क्या वास्तव में महिलाओं के लिए मातृत्व के मायने बदल रहे हैं? 'स्तनपान सप्ताह' के अवसर पर इसी चेतना को प्रसारित करने के उद्देश्य से प्रस्तुत है 'स्तनपान' के महत्व से परिचित कराती यह पोस्ट।

विश्व स्तनपान सप्ताह, क्यूँ ?
हम सभी इस बात से वाकिफ़ है कि माँ का दूध अमृत समान होता है! पहली बार मॉं बनने वाली माताओं को शुरू में स्‍तनपान कराने हेतु सहायता की आवश्‍यकता होती है। स्‍तनपान के बारे में सही ज्ञान के अभाव में जानकारी न होने के कारण बच्‍चों में कुपोषण का रोग एवं संक्रमण से दस्‍त हो जाते हैं. शिशुओं को जन्म से छ: माह तक केवल माँ का दूध पिलाने के लिए महिलाओं को इस सप्ताह के दौरान विशेष रूप से प्रोत्साहित किया जाता है. और इसीलिए स्तनपान के प्रति जन जागरूकता लाने के मक़सद से अगस्त माह के प्रथम सप्ताह को पूरे विश्व में स्तनपान सप्ताह के रूप में मनाया जाता है.

स्तनपान की आवश्यकता, क्यूँ?
थोड़ा कठिन शब्दों में जानें तो कुछ यूँ समझिये कि माँ के दूध, ख़ासकर शिशु जन्म के बाद के दूध को सामान्य दूध नहीं कह सकते बल्कि यह तो शिशु के लिए अमृत से भी बढ़कर होता है. वैज्ञानिक भाषा में इसे कोलोस्ट्रम कहते हैं. कोलोस्ट्रम यानी वह गाढ़ा, पीला दूध जो शिशु जन्‍म से लेकर कुछ दिनों (एक सप्ताह से कम) में उत्‍पन्‍न होता है. शिशु के पैदा होने के तुरंत बाद उसको माँ के इसी दूध को पीने की सलाह दी जाती है. वही सामान्य तौर पर स्तनपान भी बहुत ज़रूरी है क्यूंकि कोलोस्ट्रम तो एक सप्ताह के अन्दर ही ख़त्म हो जाता है लेकिन माँ के दूध में लेक्टोफोर्मिन नामक तत्व होता है, जो बच्चे की आंत में लौह तत्व को बांध लेता है और लौह तत्व के अभाव में शिशु की आंत में रोगाणु पनप नहीं पाते हैं. माँ के दूध में रोगाणुनाशक एलिमेंट्स भी होते हैं. बच्चा इस तरह माँ का दूध पीकर सदा स्वस्थ रहता है. कुछ लोग गाय के दूध को माँ के दूध से भी बढ़कर मानते हैं और माँ के दूध से पहले उसे देते हैं जो कि ग़लत परम्परा है क्यूंकि गाय के दूध को पीतल के बर्तन में उबाल कर दिया गया हो, तो उसे लीवर का रोग इंडियन चाइल्डहुड सिरोसिस हो सकता है। माँ के दूध में जरूरी पोषक तत्व, एंटी बाडीज, हार्मोन, प्रतिरोधक कारक और ऐसे आक्सीडेंट मौज़ूद होते हैं, जो नवजात शिशु के बेहतर विकास और स्वास्थ्य के लिए जरूरी होते हैं इसलिए सिर्फ़ माँ का दूध छह-आठ महीने तक बच्चे के लिए बेहतर ही नहीं, जीवनदायक भी होता है.

कोलोस्ट्रम क्या होता है?
माँ के प्रथम दूध को कोलोस्‍ट्रम कहते हैं यानी वह गाढ़ा, पीला दूध जो शिशु जन्‍म से लेकर कुछ दिनों (एक सप्ताह से कम) में उत्‍पन्‍न होता है, उसमें विटामिन, एन्‍टीबॉडी, अन्‍य पोषक तत्‍व अधिक मात्रा में होते हैं. एक शब्द में इसे 'अमृत' कह सकते हैं.

स्तनपान कैसे कराया जाए?
स्‍तनपान के लिए कोई भी स्थिति, जो सुविधाजनक हो, अपनायी जा सकती है. अगर बच्‍चा स्‍तनपान नहीं कर पा रहा हो तो एक कप और चम्‍मच की सहायता से स्‍तन से निकला हुआ दूध पिलायें. कम जन्‍म भार के और समय पूर्व उत्‍पन्‍न बच्‍चे भी स्‍तनपान कर सकते हैं. बोतल से दूध पीने वाले बच्‍चों को दस्‍त रोग होने का खतरा बहुत अधिक होता है अतः बच्‍चों को बोतल से दूध कभी नहीं पिलायें. जब बच्‍चा 6 माह का हो गया हो तो उसे माँ के दूध के साथ- साथ अन्‍य पूरक आहर की भी आवश्‍यकता होती हैं. अगर बच्‍चा बीमार हो तो भी स्‍तनपान एवं पूरक आहार जारी रखना चाहिए स्‍तनपान एवं पूरक आहार से बच्‍चे के स्‍वास्‍थ्‍य में जल्‍दी सुधार होता है.
आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में सिर्फ़ 23% माताएँ ही शिशु के जन्म के एक घंटे के अन्दर स्तनपान करा पाती हैं। वहीं उत्तरप्रदेश में यह आँकड़ा सिर्फ़ 7.2% है। जो कि भारतीय राज्यों में शिशु स्तनपान के अनुपात में 28 वें स्थान पर आता है। जो महिलायें शिशु को जन्म के पहले एक घंटे में स्तनपान शुरू करा देती हैं उनके पास शिशुओं को पहले 6 महीने तक सफलतापूर्वक और पूर्णतः स्तनपान कराने के व्यापक अवसर बढ़ जाते हैं। पहले 6 महीनों तक पूर्णतः स्तनपान कराने से शिशु स्वस्थ रहता है और पूर्ण क्षमता के साथ उसके विकास को भी सुनिश्चित करता है.

स्तनपान के लाभ
सबसे पहले अप ये जान लें कि माँ के दूध के टक्कर में न तो कोई जानवर (यहाँ तक कि गाय भी) का दूध है और न ही कोई कृत्रिम (artificial) दूध है. लाभ के मद्देनज़र कुछ चीज़ें यूँ समझ लीजिये कि माँ का दूध आसानी से पच जाता है जिससे शिशु को पेट सम्बन्धी गड़बड़ियां नहीं होती है. स्तनपान से शिशु की दिमाग़ी ताक़त भी बढ़ती है क्योंकि स्तनपान करानेवाली माँ और उसके शिशु के बीच भावनात्मक रिश्ता मज़बूत होता है वहीँ स्तनपान कराने वाली माताओं को स्तन या गर्भाशय के कैंसर का खतरा कम होता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि प्रेगनेंसी (Pregnency) के समय या स्तनपान के दौरान माँ का जो भी खान-पान रहता है वह बाद में बच्चे के लिए भी पसंदीदा बन जाता है वहीँ दुसरी तरफ़ स्तनपान से बच्चे का आई. क्यू. अच्छी तरह विकसित होता है,

कृत्रिम  दूध और माँ के दूध में फ़र्क़
माँ के दूध में अनेक गुणधर्म हैं, जिनका अनुकरण करना नामुमकिन है। कृत्रिम दूध में माँ के दूध के जैसी सामग्री कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, फेट और विटामिन इत्यादि डाल दिए जाते हैं, किंतु इनकी मात्रा नियत रहती है। माँ के दूध में इनकी मात्रा बदलती रहती है। कभी माँ का दूध गाढा रहता है तो कभी पतला, कभी दूध कम होता है तो कभी अधिक, जन्म के तुरंत बाद और जन्म के कुछ हफ्तों बाद या महीनों बाद बदला रहता है। इससे दूध में उपस्थित सामग्री की मात्रा बदलती रहती है, और यह प्रकृति का बनाया गया नियम है कि माँ का दूध में बच्चे की उम्र के साथ बदलाव (adjust) होते रहते हैं। भौतिक गुणवत्ता के अलावा, माँ के दूध में अनेक जैविक गुण होते हैं, जो कि कृत्रिम दूध में नहीं होते हैं। उदाहरण के लिए माँ के दूध देने से माँ-बच्चे के बीच लगाव, माँ से बच्चे के रोग से बचने के लिए प्रतिरक्षा मिलना और अन्य। इसके बावज़ूद जिन माँ को अपना दूध नहीं हो पाता है, उनके लिए फ़िर यही जानवर या कृत्रिम दूध का सहारा होता है.
-सलीम ख़ान
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